गुरुवार, 19 मार्च 2009

(बैठकी - चार)

माफ़ करो, मदद करो भाई !!

भाई अभिनव ने संशय व्यक्त किया है कि "तू हिन्दू बनेगा ..." के रचयिता संभवतः मजरूह साहब नहीं थे । उनकी बात का संज्ञान लेते हुए मैंने तमाम उपलब्ध मंचों पर इसकी पक्की जानकारी लेने की कोशिश की है ।

YouTube पर प्राप्त जानकारी के आलोक में पता चलता है कि इस गीत के रचयिता साहिर लुधियानवी थे । अब YouTube वाले कितनी पक्की जानकारी रख रहे हैं, यह मैं नहीं जानता।

मजरूह साहब को इन पंक्तियों का रचयिता मानने के पीछे मेरी एक सोच है । इसी गीत की एक अन्य पंक्ति के शब्द हैं -- "ये महलों में बैठे हुए कातिल ये लुटेरे , काँटों के ये मजरूह -ऐ- चमन बेचने वाले..... ।" चूंकि यह परम्परा रही है कि रचनाकार अपनी रचना में यदा-कदा अपना नाम डालते रहे हैं अतः मैं ऐसा समझता हूँ कि इन पंक्तियों में "मजरूह" शब्द इसी मनोविज्ञान के अर्न्तगत लिखा गया होगा (जो मजरूह साहब ने लिखा होगा)।

तथापि , तमाम विज्ञ पाठकों से विनती है कि इस सम्बन्ध में वे अपने स्तर पर जांच-पड़ताल कर लें और निश्चित जानकारी मिलने पर मुझे भी सूचित करें ।

बुधवार, 11 मार्च 2009

( बैठकी - तीन )

होली की शुभ कामनाएँ और मजरूह की यादें ...

आज होली है , मेरी शुभ कामनाएँ लें ।

रंगों का यह त्यौहार मन में कई मीठी यादों को संजोये हुए आया है और अपने साथ कुछ ऐसी खट्टी यादों को भी कुरेद गया है कि मन तड़प कर रह जाता है -- इन्सान मिलजुल कर खुशियाँ क्यों नहीं बाँट सकता ? इस या उस बहाने लोग नफरत क्यों फैलाते हैं ? और नफरत फैलाने के उद्देश्य से धर्म का बेज़ा इस्तेमाल क्यों करते रहते हैं ?खैर , अभी तो ज़रा मजरूह साहब (सुल्तानपुरी) को याद करने का वक्त हो चला है ..... ।

मालिक ने हर इन्सान को इन्सान बनाया
हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती
हमने उसे भारत कहीं ईरान बनाया
जो तोड़ दे हर बन्द वो तूफ़ान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा , इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

( बैठकी - दो )

"कौन कहता है...!! "

पिछली बैठकी के सम्बन्ध में एक सूचना : अखबार की एक कतरन को प्रस्तुत करते हुए अर्ज है कि इरादे बुलन्द हों तो "आसमाँ में जरूर सुराख हो सकता है"। जो लोग अपने कन्धों पर दी गयी जिम्मेदारी को ईमानदारी से महसूस करते हैं वे विघ्न-बाधाओं से निपटने के रास्ते भी ख़ुद ही खोज लेते हैं । एक आई० ए० एस० ऑफिसर ने ही इस दिशा में जो मिसाल दी है उसने उक्त कथा को लिखने में प्रेरक भूमिका निभाई है । पाठकों की सुविधा के लिए उक्त कतरन की पंक्तियों को दुबारा उद्धृत कर रहा हूँ :

( DECCAN CHRONICLE, Vol. 4 No. 333, CHENNAI. THURSDAY.26 FEBRUARY 2009, http//www.deccan.com )

****** COLLECTOR IN DISGUISE********

PLAYS SPY TO GAUGE THE MOOD

(By AR MEYYAMMAI)

Madurai Feb। 25 : In this era of remote-controlled administration through the Internet, the collector of Theni district has reverted to the days when rulers went around incognito to find out people's problem and evolve quick solutions।Dressed like a farmer or the man next door, Collector P. Muthuveeran has so far visited three firkas comprising over 48 villages in the last three months. Calling it 'makkalainaadi.....maavatta nirvaham ( district administration for the people), the collector selects a firka every month. " People open up their hearts to us, " said an elated Muthuveeran who has just returned from one such visit to Siluvarpatti and surrounding hamlet. After visiting a cluster of hamlets on Tuesday, he halted at a villager's house at Erumainaickenpatti for the night. Before dawn the next day, clad in a dhoti, he stepped into a tea shop and interacted with the villagers." Even before we got up, he went around the streets to check whether the light were burning, " said Erumainaickenpatti president P. Thambithurai. All the 16 diabled persons he met were issued orders for assistance. A wine shop in D. Vadipatti was closed down after complaints from women. During his last visit to Varsanaadu, Mr. Muthuveeran went wearing a lungi to a P.D.S. shop. Even without a ration card, he was able to buy kerosene. " The employee was severely warned and officials keep a tab on the shop now, " Mr. Muthuveeran said.

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( बैठकी - एक)

आई० ए० एस०

यह उस महान देश की कथा है जहाँ ज्यादातर सफेदपोश लोग रहते थे और जिनका चरित्र दोगला था।

उस महान देश की एक महान फ़िल्म थी "मुग़ले-आज़म" जिसका नायक अपनी माँ की मनुहार से पिघल नहीं रहा था --- उसके बाप का तथाकथित उसूल उसके अपने मन्सूबे के आगे कौड़ी का दो ठहर रहा था । और तब माँ ने तुरुप का पत्ता फेंका था -- तुझे दूध का वास्ता है, मान जा । पट्ठे ने पलटवार किया था -- आप दूध की कीमत मांग रही हैं ।

उस महान देश के एक शीत-प्रदेश में मनोहर घाटियों और मनोरम वादियों के बीच एक ऐसी टकसाल थी जहाँ "नौकरशाह" ढलते थे । यहाँ इन नौकरशाहों को देश का प्रशासन चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता था । मगर प्रशासन चलाने का यह अर्थ नहीं होता था कि उसे किसी क्षेत्र-विशेष का राजा बना दिया जाता हो जिसे शेष प्रजा पर अपने मन-माफिक हथौड़ा चलाने की आज़ादी हो --- बल्कि यह था कि प्रजातान्त्रिक देश होने के नाते उस क्षेत्र-विशेष के लोग देश के क़ानून के दायरे में जीवन-यापन कर रहे हैं , बस इसे सुनिश्चित करना था । इस टकसाल से निकले नौकरशाह "आई० ए० एस०" कहलाते थे जिन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण के उद्देश्य से उस क्षेत्र के भिन्न-भिन्न सरकारी कार्यालयों की आन्तरिक कार्य-प्रणाली से सीधे-सीधे रू-ब-रू होने के लिए "प्रशिक्षु" के तौर पर भेजा जाता था । इस टकसाल से निकले नौकरशाह ख़ुद को किसी वास्तविक राजा से कतई कम नहीं समझते थे और मजेदार बात यह थी कि उस देश की जनता भी ऐसा ही समझती थी । ऐसे में जो बात असल में ज्यादा ख़राब थी वह यह थी कि ख़ुद को राजा समझने के मनोविज्ञान में ये नौकरशाह स्वतन्त्र तर्क-शक्ति से चिन्तन कर सकने में और न्यायोचित निष्कर्ष पर पहुँच सकने में प्रायः नाकामयाब रहते थे । किसी "नतीजे" तक पहुँचने के लिए प्रतिपक्षी कोण से भी मामले को देखना उनके लिए कोई ईमानदार जरूरत नहीं हुआ करती थी । यानी ये नौकरशाह एकचटिया विचारधारा के गुलाम होते थे जहाँ शेष वैचारिक हवाओं का उनके मष्तिष्क में प्रवेश निषिद्ध होता था।

उस महान देश की एक प्रसिद्व लोक-कथा थी जिसका नायक एक बाघ था और जिसने एक बार एक बड़े ही मासूम-से खरगोश को अपने जबड़े में दबोच लिया था । उस देश के राजा की नजर इस दृश्य पर पड़ गयी थी और प्रजा-वत्सल उस राजा ने खरगोश को बचाने की नीयत से अपने तरकश से तीर निकालकर बाघ पर निशाना साध लिया था । उसी क्षण बाघ बोल पड़ा था - " हे राजन ! मैं भी तो आपकी ही प्रजा हूँ और यह खरगोश तो मेरा प्रकृति-प्रदत्त भोजन है । मुझे मारकर आप पाप के भागी क्यों बनना चाह रहे हैं ?" राजा किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया - उसे महसूस हुआ कि वह बगैर रीढ़ की हड्डी का एक अदना इन्सान है जो किसी दोराहे पर खड़े होकर फैसले नहीं ले पाता कि मेरे लिए दाँये जाना उचित है या बाँये । इस टकसाल से निकले नौकरशाह इसी राजा की तरह अविवेकी हुआ करते थे । व्यापक परिप्रेक्ष्य में सोच पाना इनके लिए सम्भव नहीं हुआ करता था । वे बहुधा क़ानून बनानेवालों को कोसते रहते थे ।

" अंखफोड़वा काण्ड " में पुलिस ने क्या ग़लत किया ? पूछताछ (INTERROGATION) के लिए जब जज किसी अपराधी को पुलिस के हाथों रिमाण्ड (REMAND) पर सौंपता है तब क्या उसे मालूम नहीं होता कि पुलिस पूछताछ के नाम पर कौन-कौन से हथकन्डे अपनायेगी ? या उसे यह नहीं मालूम होता कि ठीक उसकी नाक के नीचे बैठा उसका पेशकार "तारीख" देने के नाम पर वादी-प्रतिवादी दोनों से पैसे ऐंठता रहता है जो यकीनन एक भ्रष्ट आचार है ? और पैसे का ऐंठा जाना उस मुकद्दमे तक के लिए कोई अपवाद नहीं जो ख़ुद एक भ्रष्टाचार का मुकद्दमा है? छोटे-मोटे पेशकारों को तो जाने दीजिये, वे तो छोटी मछलियाँ हैं -- देश के सर्वोच्च न्यायालय के जज के ही आचरण पर जब भ्रष्टाचार से जुड़े सवाल उठते हैं , उसके बेटे को गैरकानूनी तरीके से - "बिल्डर्स" होने की हैसियत से - सरकारी जमीन के आबंटन का मामला जब अखबार की मोटी-मोटी सुर्खियों की जगह ले लेता है तब कौन-सा क़ानून उसके बेटे को या उसे अपने घेरे में ले पाता है ? जब कोई लड़की सिर्फ़ ब्रा-पैन्टी में सड़कों पर उतरकर अपने ससुराल वालों के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान करने को मजबूर होती है तब इस पिद्दी-से देश का हिजड़ा क़ानून किसी का क्या बिगाड़ पाता है ? इसके पीछे कौन-सी पृष्ठभूमि होती है , कौन-सी ताकतें इसके लिए असल में जिम्मेदार होती हैं ? जब हजारों-लाखों लड़कियाँ दहेज़ की बलिवेदी पर जलाकर राख कर दी जाती हैं, अनगिनत लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है तो कहाँ का क़ानून असली गुनहगारों को अपने गिरफ्त में ले पाता है ? जिन बेवकूफों ने क़ानून बनाए थे उनने उन धूर्त्तों की धूर्तता का ख़याल क्यों नहीं रखा जो उनके बनाए क़ानून की आँखों में धूल झोंक पाने में सफल हो जाते हैं ? क्यों ? क्यों ?? ....... ये सवाल उन बहुत सारे सवालों में से कुछेक सवाल थे जो ऐसे नौकरशाहों के तथाकथित उच्चतम-स्तरीय (सुपरलेटिव) मस्तिष्क में उठते रहते थे पर जिनका उनके पास कोई जवाब नहीं हुआ करता था । मन ही मन अपनी कुर्सी के ऊपर दीवार में लगे महात्मा गाँधी की तस्वीर को कोसते रहना इन महानुभावों की एक आम प्रगतिशीलता हुआ करती थी --- बुड्ढा खूसट कहीं का, सारे फसाद की जड़ यही तो था !!!

ऐसे लोगों के पास कोई दूरदृष्टि नहीं होती थी और न ही कोई विवेकी-तार्किक चिन्तन होता था । ये स्वनामधन्य ' हरक्युलिस ' होते थे और जो किसी हद तक इमोशनल भी होते थे । इन्हें बच्चन की कवितायें बहुत भाती थीं पर जो निराला की फक्कड़ी के कायल न थे -- दुराचार, दुर्व्यवस्था, अत्याचार और अन्याय के ख़िलाफ़ ये लोग सोच भर तो सकते थे पर कोई रचनात्मक या प्रतिकारी कदम नहीं उठा सकते थे -- अपनी "सीमाओं" के अन्दर रहते हुए भी नहीं । ये जमाने को बदल डालना तो चाहते थे पर शुरुआत कहाँ से करें ( "हमीं क्यों करें" की दुविधा के साथ ), और कैसे करें -- इस बिन्दु पर हमेशा अटक जाया करते थे । दुष्यंत की ये पंक्तियाँ ( हाँ, शायद दुष्यंत की ही ) इन्हें कभी अपील नही करती थी :

कौन कहता है आसमाँ में सुराख नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों !!

..........तो, ऐसे ही एक प्रशिक्षु आई० ए० एस० ऑफिसर की सच्ची कथा है यह (अरे यारो, कहीं सचमुच में सत्य-कथा मत मान बैठना, कहीं कोई ताव खा बैठा तो ...) जिसका कुछ समय एक बार एक थाने में गुजरता है ।

(दृश्य - एक)

" तुमने चोरी की ? " ये थानेदार था ।

"................" एक जवाब मिलता है । प्रशिक्षु ऑफिसर मन ही मन कुछ बुदबुदाने लगता है -- स्साला , सरासर झूठ बोल रहा है, चेहरे से ही समझ में आ रहा है ।

(दृश्य- दो)

" तुमने बलात्कार किया ? " थानेदार इस बार ज्यादा ही कड़क था ।

"................" एक जवाब मिलता है । साहब की बुदबुदाहट --- स्साला , सरासर नौटंकी कर रहा है ....यह समाज कैसे चलेगा , कैसे चलेगा ?

(दृश्य - तीन)

" तुमने डाका डाला ? "

".................." एक जवाब मिलता है । साहब की मन ही मन होने वाली समाज-शास्त्रीय प्रतिक्रिया --- स्साले को और कोई काम नहीं मिला ?

(दृश्य - चार)

" तुमने खून किया ?"

"....................." एक जवाब मिलता है । साहब विस्मित है -- खूनी लोग ऐसे ही होते हैं ? दिखने में तो एकदम आम आदमी जैसा सीधा-सादा दिखाई दे रहा है ?

(दृश्य - पाँच)

" तुमने दहेज़ लिया ? "

" हाँ हुजूर, लिया । "

" क्यों ? "

" क्योंकि मुझे अपनी बेटी की शादी भी करनी है । दहेज़ लूँगा नहीं तो दूँगा कहाँ से ? अभी इंजीनियरिंग पढ़ रही है । उसी के स्टैण्डर्ड के हिसाब से लड़का भी तो खोजना है ? "

" तुम्हारा लड़का क्या कर रहा है ?"

" अभी-अभी आई० ए० एस० बनकर निकला है । दौलतपुर में अभी प्रशिक्षु ऑफिसर के तौर पर एस० डी० ओ० के रूप में कार्यरत है । "

"कितना दहेज़ लिया है तुमने ? और हाँ, तेरी बहू कितनी पढ़ी-लिखी है ?" थानेदार को उसकी बातों पर अब भी विश्वास नहीं हो रहा था और वह सिर्फ़ रस लेने के इरादे से एक के बाद एक प्रश्न पूछे जा रहा था ।

" हुजूर , मेरे बेटे ने अपनी बहन के लिए कुर्बानी दी । मार्केट में इन दिनों हमारी जाति में रेट यह चल रहा है कि यदि आई० ए० एस० लड़की से शादी करनी है तो दहेज़ बिल्कुल नहीं मिलेगा । लड़की यदि डॉक्टर या इंजिनियर हो तो मामूली दहेज़ मिलेगा -- यही कोई 50-60 लाख मानकर चलिए । और यदि लड़की उससे भी कम स्तर की पढ़ी-लिखी हो यानी जो खाँटी रूप से ' हाउस-वाइफ ' ही बनी रह सकती हो तो डेढ़ करोड़ न्यूनतम का रेट चल रहा है। इससे ज्यादा भी मिल सकता है यदि उसमें रंग, रूप , ऊँचाई आदि से सम्बद्ध कोई खोट हो । मेरे बेटे ने अपनी बहन के लिए कुर्बानी यह दी है कि उसने जानबूझकर एक ऐसी लड़की को पसन्द किया जिसकी अभी तो पढ़ाई भी ख़त्म नहीं हुई थी ताकि हमें दहेज़ मोटा मिले । अब देखिये न , हमारे पास पैसा बच कहाँ रहा है ? 50-60 लाख से ऊपर तो उसकी बहन की शादी में खर्च हो जायेगा और शेष रकम से हम अपना एक आलीशान मकान बनायेंगे और एक गाड़ी खरीदेंगे । और इसके बाद भी अगर थोड़ा-बहुत पैसा बचेगा तो उसे किसी अच्छी जगह निवेश कर देंगे ताकि उसपर कुछ कमाई होती रहे । इस तरह हमारा बुढ़ापा आराम से कट सकेगा । सो, हमें तो नहीं लगता कि हमने कुछ ग़लत किया है । आप ही बताइये कि इसमें ग़लत क्या है । हमने अपने बेटे को पढ़ाया-लिखाया, आदमी बनाया -- क्या हमारा उसपर इतना भी अधिकार नहीं ? "

"और अभी जो तुझे हम दहेज़ लेने के जुर्म में सीखचों के पीछे डालेंगे तब क्या करेगा तू ? "

" आप ऐसा नहीं कर सकेंगे हुजूर । आप अपनी नादानी में मुझ पर अविश्वास करने की एक के बाद एक भूल करते जा रहे हैं । मैंने आपको बताया न कि प्रशिक्षु ही सही मेरा बेटा आई० ए० एस० ऑफिसर है । थोड़ी ही देर में आपकी 'बड़ी बिरादरी' से फोन आ जायेगा और आप मुझे छोड़ने को विवश होंगे । और हाँ, आप तो मुझसे अपने गुस्ताख सम्बोधन समेत अन्य गुस्ताखियों के लिए माफी भी मांगेंगे । "

और ठीक उसी क्षण फोन घनघना उठा ।

" हाँ सर , सर, बस अभी तुरन्त सर , गलती हो गयी सर, पहचान नहीं पाया सर , माफ़ कर दीजिये सर ..... " थानेदार के चेहरे पर पसीने छूट रहे थे और जो इस बात से बेखबर था कि बगल के कमरे में उसी का अधीनस्त एस० आई० इस पूरे नजारे पर मुस्कुरा रहा था । दरअसल उसने जिद्दी थानेदार को पहले ही सावधान किया था -- इस आदमी पर हाथ मत डालिए सर, उड़ती ख़बर है कि इसका बेटा आई० ए० एस० ऑफिसर बन गया है । क्या पता कहीं यह ख़बर सच हो ।

अचानक एक घटना घटी । हमारी कथा का नायक -- प्रशिक्षु आई० ए० एस० ऑफिसर -- गश खाकर कुर्सी से नीचे गिर पड़ा । थाने में तो जैसे कुहराम मच गया । सभी दौड़े । कोई पंखा झलने के लिए तो कोई पानी के छींटे छोड़ने के लिए । और हमारा नायक ? वह अपनी अचेतावस्था में अपने बचपन की कुछेक गुजर रही तस्वीरों से उलझ रहा है जो ठीक सिनेमा के दृश्यों की माफिक उसके मानस-पटल पर एक-एक करके आ-जा रही थीं ।

........वह अपने एक हाथ से अपने पिता की उंगली थामे हुए था और उसके दूसरे हाथ में सब्जी का थैला था -- यही करीब 9-10 साल की उम्र रही होगी उसकी ।

" इन मुर्गियों का क्या भाव लगाया है, भैय्या ? " उसके पिता पूछ रहे थे ।

" भाई साहब, इधर वाली का पचास रूपये प्रतिकिलो और उधर उस कोने वाली का चालीस रूपये । "

" काहे भैय्या, इतना फर्क क्यों लगा रहे हो ? इधर वाली का ही चालीस लगा दो और एक किलो दे दो । "

" नहीं हो पायेगा भाई साहब । आप ख़ुद से देख लीजिये, क्वालिटी का फर्क है या नहीं । ये सब ठहरीं विशुद्ध देशी मुर्गियाँ -- खालिस मुलायम गोश्त वाली चूजियाँ और कहाँ वो सब पोल्ट्री फॉर्म की कड़े गोश्त वाली मोटी और बूढ़ी मुर्गियाँ । .... चलिए आप ठहरे पुराने ग्राहक, आपको 45 रूपये लगा देता हूँ । "

किसी ने हमारे नायक के चेहरे पर छींटे मारे । नायक कुनमुनाया । लगा होश आ रहा है , पर नहीं , वहाँ तो रील चल रहा था ......।

" अरे साफ़-साफ़ सुना दीजिये न , डेढ़ करोड़ से कम में नहीं होगा ...... हमारा भी तो खर्चा है ना भाई ..... " यह नायक की माँ थीं जो फोन पर गुप्ता जी से बतिया रहे उसके पिता को डांट रही थीं बगैर इस बात की परवाह किए कि उनकी तेज आवाज़ गुप्ता जी को भी उस तरफ़ सुनाई पड़ सकती है । बल्कि वह तो चाहती ही यही थीं कि शिष्टाचारवश जो बात उसके पिता साफ़-साफ़ बोलने में हिचक रहे थे वो बात इस कायदे से ही सही गुप्ता जी को ठीक-ठीक समझ में आ जाए ।

" नहीं नहीं गुप्ता जी, इतना में कैसे होगा ..... । " हमारा नायक सीढ़ियों से उतरते हुए यह सब सुन रहा था । गुप्ता जी की लड़की को हमारे नायक ने पसन्द किया था जो अभी पढ़ाई कर ही रही थी । यह भी अजब संयोग था कि उसकी बहन भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी जिसके लिए किसी आई० ए० एस० लड़के की तलाश हो रही थी। और हमारे नायक ने भी गुप्ता जी की लड़की की पढ़ाई ख़त्म करने की शर्त्त लगाई थी एवं उससे एक विशुद्ध 'हाउस-वाइफ' बने रहने की चाहत रखता था ......।

तभी हमारा नायक फिर कुनमुनाया, जैसे उसकी तन्द्रा सचमुच टूट रही है । किसी ने फ़िर से पानी के छींटे झोंके । वह धीमे से कुछ बुदबुदा रहा था ........ डेढ़ करोड़ ..... दूध का वास्ता ..... डेढ़ करोड़..... रीढ़ की हड्डी .... डेढ़ करोड़ ....मुलायम गोश्त ...।

(पुनश्च : पाठको, कथा-शिल्प की माँग के अनुकूल कथा का क्लाइमेक्स वैसा ही दर्शाया गया है जैसा कि अमूमन होता आया है । पर असल में ऐसा हुआ नही था । तब ? हुआ क्या था ?........ हुआ यह था कि जैसे ही उक्त कथा में फोन की घन्टी का घनघनाना शुरू हुआ था वैसे ही हमारा नायक कुर्सी से उछल पड़ता है और बड़ी ही बेशर्मी से अट्टहास करने लगता है --हा , हा , हा , हा ... )

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(एक जरूरी बात अगली बैठकी में ...)