मुख़र्जी की बैठक

मेरी इस ब्लौगिया बैठक में आप सभी हिन्दी वाले आमन्त्रित हैं। गप-शप, हँसी-मजाक, गम्भीर विमर्श और बैठे-ठाले कुछ भी -- जिससे हिन्दी का कुछ कल्याण हो -- सब चलेगा, सब में आप सज्जनों की हिस्सेदारी का तलबगार हूँ ।

शनिवार, 12 जून 2010

(बैठकी - पन्द्रह)

उसी कड़ी की कुछ और लड़ियाँ आपकी नज्र हैं :

(एक)


(दो)

Posted by ज़ाहिद मुख़र्जी on शनिवार, जून 12, 2010
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1 टिप्पणी:

mobile phones ने कहा…

अच्छा लगता है।

19 जून 2010 को 3:17 am बजे

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मेरे बारे में

ज़ाहिद मुख़र्जी
एक बंगाली माता और बिहारी पिता की इकलौती औलाद हूँ जिसका पूरा जीवन गलियों-चौराहों पर लोगों की गालियाँ और जूते खाते बीता -- इससे अधिक वे दे भी क्या सकते थे जिनका ख़ुद का जीवन भी इसी तरीके से गुजरा था । हाँ , वे मुझको प्यार करना सिखा सकते थे जो उन्होंने बखूबी किया और इसके रास्ते में उनका अलग-अलग का धर्म कोई बाधा नहीं बना -- बल्कि उसकी भिन्नता ने इसमें मदद ही पहुँचाई । शायद इससे अच्छी योग्यता मेरी और कुछ भी नहीं कि स्कूल के फार्म में मेरे धर्म की जगह "इन्सानियत" लिखा है जो मेरे धर्म-पिता ने लिखवाई थी और जिनका ख़ुद का भी कोई धर्म न था।
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