होली की शुभ कामनाएँ और मजरूह की यादें ...
आज होली है , मेरी शुभ कामनाएँ लें ।
रंगों का यह त्यौहार मन में कई मीठी यादों को संजोये हुए आया है और अपने साथ कुछ ऐसी खट्टी यादों को भी कुरेद गया है कि मन तड़प कर रह जाता है -- इन्सान मिलजुल कर खुशियाँ क्यों नहीं बाँट सकता ? इस या उस बहाने लोग नफरत क्यों फैलाते हैं ? और नफरत फैलाने के उद्देश्य से धर्म का बेज़ा इस्तेमाल क्यों करते रहते हैं ?खैर , अभी तो ज़रा मजरूह साहब (सुल्तानपुरी) को याद करने का वक्त हो चला है ..... ।
मालिक ने हर इन्सान को इन्सान बनाया
हमने उसे हिन्दू या मुसलमान बनाया
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती
हमने उसे भारत कहीं ईरान बनाया
जो तोड़ दे हर बन्द वो तूफ़ान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा , इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा

6 टिप्पणियां:
मजरूह साहब ki bahut achhi line batai hain aapne dhanya waad
स्वागत है आप का , इसी परकार लेखन करते रहे
ब्लॉग जगत में हार्दिक स्वागत है ....
लेखन के लिए शुभकामनाएं ...........
Aaapke vicharon ne prabhavit kiya. Swagat.
narayan narayan
जाहिद साहब,
जहाँ तक मेरी याददाश्त जाती है, ये पंक्तियाँ शायद साहिर लुधियानवी की हैं. संभव हो तो सुनिश्चित कर लें।
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