नव वर्ष 2010 पर
दोस्तों को इस नाचीज़ का सलाम ! खुदा आपकी सेहत को सलामत रखे और हर किस्म की तरक्की दे !!
नए साल का हाल यह रहा कि किन्हीं खास अध्यायों में लिपटे रहने की वजह से आपको सही समय पर सलामती की दुआ तक नहीं दे पाया । खैर ! पिछले दिनों अचानक एक खास चीज़ पर निगाह अटक गयी । कैफे में सर्फिंग करने की गरज से एक दिन बैठा तो पाया कि पिछले वाले जनाब अपना ईमेल लौग आउट करना भूल गए थे । खुले पन्ने को पढ़ना वैसे तो एक घोर अनैतिक बात होती है पर उस पन्ने पर कुछ ऐसा ख़ास लगा कि उसपर लिखे को आद्योपान्त पढ़ने को मजबूर हुआ । आपके अवलोकन और अध्ययन-मनन हेतु उसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ ( सिर्फ सम्बोधन , नाम-पता और वैसी जानकारियों को मैंने जानबूझकर काल्पनिक शब्दों में बदल डाला है जिनसे सम्बन्धित लोगों की पहचान हो जाने की मुझे सम्भावना लगी ) :
प्रिय रमेश बाबू ,चिरंजीवी रहें !!
कल मुझे आपके पास पहुंचना है और आज मैं आपको यह पत्र लिखने बैठा हूँ । क्यों ? सच पूछिए तो ठीक-ठीक ख़ुद मुझे भी नहीं पता कि मैं ऐसा करने क्यों बैठ गया हूँ । शायद इसलिए कि मैं ख़ुद भी उन तमाम लोगों में से ही एक हूँ जो वार्तालाप के दौरान उचित समय पर अपनी भावनाओं को सटीक अभिव्यक्ति नहीं दे पाते । बल्कि ज्यादातर लोग तो इस दौरान इस कदर असंगत शब्दों और वाक्यों का प्रयोग कर बैठते हैं कि पूरी बातचीत ही ग़लत दिशा में निर्देशित हो जाती है और मनुष्य अपने सार्थक उद्देश्य से भटक जाता है । कई बार तो यह गड़बड़ी इतनी भयंकर हो जाती है कि अर्थ का अनर्थ तक हो जाता है । ..... खैर ! मुझे लगता है कि अपनी तयशुदा अभिव्यक्ति देने में बोलने की बजाय लिखना मुझे ज्यादा सहज बनाता है । लेकिन अब जब मैं लिखने बैठ ही गया हूँ तो मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि शुरू कहाँ से करूं और कैसे करूं ?
मेरे पास यह इन्कार करने की कोई वजह नहीं है कि मैं रौशनी के ही विषय में बात करूंगा । यह जानने के बाद भी कि रौशनी आपके जीवन का एक ऐसा कसैला अध्याय बन चुकी है कि पति-पत्नी के रिश्तों के बीच का अपेक्षित माधुर्य अब शायद ही उस अध्याय को एक दुःस्वप्न की स्मृतियों की तरह भुलवा पाने में समर्थ हो सके । मैं यह मानता हूँ कि " होहिहैं वही जो राम रचि राखा " पर साथ ही यह भी मानता हूँ कि बिगड़ती बात को बना देने का प्रयास करना हर उस आदमी का मानवोचित कर्तव्य है जो उस मामले की सीधी अथवा परोक्ष जानकारी रखता है । तो एक ऐसा जानकार होने के नाते जिसे इस मामले के प्रायः सभी पहलुओं की जानकारी है मैं इसे अपना कर्तव्य समझता हूँ कि वक्त और परिस्थितियों के आईने में उभरते हुए हर उस अक्स से आपको रू-ब-रू कराने की कोशिश करूँ जो मेरी नजर में जरूरी रूप से आपको बताये जाने के काबिल है। ताकि आर-पार के फैसले लेने से पहले (जिसकी अटकलबाजी लगाने के लिए मेरे पास आपकी गतिविधियों के बारीक कारण मौजूद हैं) एक ईमानदार चिन्तन आप कर सकें और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपने यथोचित सामाजिक व पारिवारिक उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकें । इसलिए भी कि उम्र की कमी और उम्र की कमी से उत्पन्न तजुर्बे की कमी एक कुदरती वास्तविकता के रूप में आपके व्यक्तित्त्व का अंग है और इसलिए भी कि आपके इर्द-गिर्द का जो तजुर्बेकार संसार है वह कहीं-न-कहीं आपको उचित, कड़े और खरे मार्ग-निर्देश देने में चूक गया है कि मौजूदा दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारी से परिपूर्ण आपके अपने हिस्से का रवैया कैसा होना चाहिए । (शायद इसकी वजह उनकी हर शुभेक्षा के बावजूद उनकी भी अभिव्यक्ति की अक्षमता ही हो जिसका उल्लेख मैंने ऊपर किया है । या फ़िर इसकी जड़ में वह मनोवैज्ञानिक प्रभाव हो जो आपकी चमत्कारिक व्यावसायिक-सफलता की चकाचौंध से उपज सकता है।)
आगे बढ़ने से पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं यह दिल से मानता हूँ कि विधाता ने दरअसल एक दुर्भाग्य के तौर पर रौशनी को आपकी झोली में डाल दिया है । लेकिन इतिहास गवाह है कि शक्तिशाली पुरुषार्थ ने हमेशा से हर दुर्भाग्य पर विजय हासिल की है, उसे सौभाग्य में बदला है । और मुझे इस बात के भरपूर संकेत मिलते रहे हैं कि आपके पास एक शक्तिशाली पुरुषार्थ है । मैं इस सिद्धान्त में यकीन करता हूँ ( और यह मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव भी है ) कि विधाता तकदीर की दुखदाई रेखाओं को असीम साहस एवं ठोस पुरुषार्थ की कसौटी पर खरा पाने के बाद उसे बदल डालने को मजबूर होता है । इसके अतिरिक्त कठोरता प्रदर्शित करने के आपके प्रयासों के बाद भी उनमें निहित मानवीय संवेदनाओं की जो झलक यदा-कदा मेरी नजरें ताड़ लेती हैं उनके आधार पर भी मुझे लगता है कि दिल खोलकर बात करने से दुर्गम से दुर्गम रास्ते मनोहर वादियों में खुल जा सकते हैं ।मेरी ससुराल कोई पढ़ा-लिखा परिवार न था , पर जिसका मुझे कोई ख़ास मलाल न था । तथापि मुझे इसका तो मलाल था ही कि मेरी पत्नी पढ़ी-लिखी न थी । अपने माता-पिता पर मुझे गहरा आक्रोश था कि मेरी इच्छा की क़द्र नहीं की गयी । चोट इसलिए भी लगी कि लड़की देखने-चुनने में वे मेरी तरफ़ से पूरी तरह आजाद थे । मेरी एकमात्र इच्छा की पूर्ति नहीं हुई कि मैं काली-कलूठी, अन्धी-लंगड़ी कैसी भी लड़की से शादी करने को तैयार हूँ बशर्ते कि वह पढ़ने-लिखने में प्रतिभाशाली हो । मुझे ठगनेवाली सूचनाएं दी गईं और मेरे पल्ले एक ऐसी पत्नी मढ़ दी गयी जो मानसिकता और बौद्धिकता के धरातल पर मेरे सामने कहीं नहीं ठहरती थी । मैंने समझौता करके अपनी जिन्दगी चलानी चाही पर उसमें भी मुझको पराजय हासिल हुई । मैं चाहता था कि मेरी पत्नी मेरे बताए रास्ते पर चले, मेरे निर्देशों पर चले ; पर वहाँ तो बात ही उल्टी थी । सात साल का समय कितना छोटा या बड़ा होता है, यह आप ख़ुद भी समझ सकते हैं, जिस दौरान हम पति-पत्नी सिर्फ़ रस्म निभाने को एक साथ बिस्तर पर सोते-भर थे । हममें मामूली से मामूली बातचीत तक नहीं होती थी । यन्त्र की तरह वह मुझे खाना परोस देती थी और मैं भी यन्त्र की तरह ही आधा-अधूरा खाना खा लेता था । उसी तरह कपड़े मिल जाते थे और पहन कर मैं अपनी राह चल देता था । घर वापसी रोज रात ग्यारह-बारह बजे के करीब होती थी जब पूरा मोहल्ला सो चुका होता था । घर में कोई भी मुझसे बात करने का साहस नहीं करता था चूँकि मैं हद से ज्यादा गुस्सैल था । कैसी नारकीय जिन्दगी थी मेरी !!प्रश्न है कि मैं किस पर नाराज था ? शायद सबों से । शायद अपने-आप से भी । शायद मैं यह चाहता था कि जो हुआ सो हुआ, पर अब भी तो मेरे माता-पिता अपनी गलती महसूस करें । और अपनी गलती के एवज में मुझको बाकायदा एक ऐसे किस्म की मक्खनबाजी भी करें कि मैं तो अपनी पत्नी की टांग-खिंचाई करता फिरूँ और उसके अवगुणों की दास्ताँ बघारा करूँ ( जिसपर वे हिन्दुस्तानी परम्परा के आलोक में अगाध रूप से प्रसन्न होते रहें ) पर डायरेक्ट-इनडायरेक्ट तरीके से वे मेरी पत्नी को मेरे करीब लाने का सुप्रबन्ध भी जरूर कर दें । दुर्भाग्य से यह कभी सम्भव नहीं हुआ । और जब विशुद्ध रूप से अपने स्तर पर मैं पत्नी को एडजस्ट करके चलना चाहता तब भी मुसीबत थी । अब उन बातों को याद कर हँसी भी आती है और कभी ख़ुद पर गुस्सा भी आता है। हर एंगिल से पाता हूँ कि कोई भी दूसरा इस मामले में कत्तई दोषी नहीं था, जो दोष था मेरा ही था। पर उस समय समझ ही कहाँ थी? होता यूँ था कि जैसे मुझे अपनी बीबी के साथ सिनेमा जाना है और जिसकी घोषणा मैंने घर में कर दी है । सिनेमा के अलावे मान लें कि मुझे और भी दो-चार जगहों पर जाना है जिन्हें मैं घरवालों को बताना नहीं चाह रहा हूँ ( जैसे रेस्टोरेन्ट या कहीं और ) तो मैंने अपनी मिसेज को सिखा दिया कि तुम्हें इसे गुप्त रखना है । पर वो क्यों मानेंगी ? थोड़ा-बहुत छिपाने की कोशिश जरूर करती होंगी पर मेरी माँ और बहनों के सामने उनकी ज्यादा देर तक चल नहीं पाई और फ़िर पूरा का पूरा सच उगल दिया । मेरे को तो खैर कोई छेड़ने का साहस ही नहीं करता था पर सच्चाई के इस तरह खुल जाने से मेरा गुस्सा चरम सीमा तक उबल पड़ता था । किस पर ? जाहिर है कि बीबी के अलावे और किसपर अपना आक्रोश उतार सकता था । माँ-बाप तो हर अपराध के बाद भी आख़िर माँ-बाप ही थे सो उनके हिस्से का गुस्सा भी बीबी पर ही उतरता था ..... ।ऐसी कुछेक घटनाएँ घट जाने के बाद सात साल की अवधि तक हममें दरअसल कोई रिश्ता ही नहीं रह गया , जिसका मैंने ऊपर उल्लेख किया है । उसके बाद दैवयोग से मेरे हाथ बच्चनजी की आत्म-कथा लग गयी। (बच्चनजी यानी डा० हरिवंश राय बच्चन, हिन्दी साहित्य के उच्चतम शिखर के कवि-लेखक जिन्होंने साहित्य में "मधुशाला" लिखने के साथ-साथ "हालावाद" की नई धारा भी बहाई और प्रतिष्ठा की चोटी को भी छुआ ---- उनके सुपुत्र बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन कहते नहीं थकते कि अपने पिता की प्रतिभा और विद्वता की तुलना में वे सरसों से ज्यादा नहीं हैं) । यह पुस्तक कई खण्डों में प्रकाशित हुई है जिनमें से दो ही के नाम अभी मुझको याद हैं -- एक का " क्या भूलूँ क्या याद करूँ " और दूसरे का " नीड़ का निर्माण फ़िर " । इसके दो खण्ड और भी हैं जिनके नाम अभी मेरी स्मृति में नहीं हैं। डा० बच्चन की पहली पत्नी श्यामा ( अमिताभ उनकी दूसरी पत्नी तेजी बच्चन के सुपुत्र हैं, पहली पत्नी बगैर किसी बच्चे को जन्म दिए ही स्वर्ग सिधार गयी थीं ) से उनके यानि बच्चनजी के रिश्ते अच्छे नहीं थे । कहाँ बच्चन जी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ( अंगरेजी भाषा के ) प्राध्यापक -- जिनकी विद्वता के चर्चे सारे भारत में ही नहीं विश्व-पटल पर भी गहरी छाई हुई थी -- और कहाँ श्यामा देवी जैसी निपट गंवई संस्कारों वाली एक अत्यल्प पढी-लिखी (या शायद बिल्कुल जीरो) महिला। उन्होंने लिखा है कि " जब मैं अपने फ्रस्ट्रेशन के चरम शिखर पर था और किसी भी तरह से उसे समझौते के प्लेटफोर्म पर उतार नहीं पा रहा था तभी एक दिन मेरे मन में एक तर्क उभर कर आया ..... माना कि उसे मेरे बौद्धिक या मानसिक स्तर पर लाना असम्भव है पर क्या मेरे जैसे इन्सान के लिए ख़ुद उसके स्तर पर नीचे उतर आना भी असम्भव है ? अगर मैं ही गंवई संस्कारों वाले व्यवहार का चोला पहन लूँ तो क्या वह खाई जो हम दोनों के बीच है वह ख़त्म नहीं की जा सकती ? मुझे लगा कि मेरे लिए तो यह एक आसान रास्ता है और मैं इसी रास्ते पर चल पड़ा । दुनिया जानती है कि जबतक वह जिन्दा रही हमारे रिश्ते न सिर्फ़ मधुर रहे बल्कि इसने एक ऐसे आदर्श दाम्पत्य जीवन की सृष्टि की जिसकी मिसाल दी जाती है । जब वह गयी तो उसकी याद में मैंने ढेर सारी कवितायेँ लिखी जिसका गवाह हिन्दी साहित्य रहा है । जब मेरी दूसरी शादी के लिए लगातार प्रयास मेरी अनिच्छा के बावजूद जारी रखे जा रहे थे तभी मैंने बहुत दुखी मन से लिखा था --- " हाथों में है राख चिता की, मांगती सिन्दूर दुनिया .... हाय कितनी क्रूर दुनिया !! " कहना न होगा कि सात साल की लम्बी अवधि बीत जाने के बाद , उनकी आत्म-कथा के इस अंश ने मुझ पर एक गहरा असर डाला और बड़ी कोशिश के बाद मैंने भी ख़ुद को जिन्दगी के उन रंगों में ढाल पाने में सफलता पाई जिसके आधार पर आज मैं कह सकता हूँ हमलोग बहुत अच्छे लाइफ-पार्टनर हैं।
एक चीज होती है जिसे हम संस्कार कहते हैं । यह शिक्षा से अलग एक चीज है । मैंने देखा है कि मानवीय सद् गुणों और प्रेम की संवेदनाओं से भरपूर ऐसे संस्कार उन घरों में भी मिल जाते हैं जहाँ शिक्षा की रोशनी नहीं पहुँची है और उन घरों में भी जहाँ शिक्षा की कोई कमी नहीं । ठीक इसी तरह इन संस्कारों का अभाव भी यदा-कदा दोनों तरह के घरों में देखने को मिल जाता है । पर, एक बात जरूर देखी गयी है कि जहाँ इन संस्कारों की कमी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही थी वहाँ जब शिक्षा का प्रकाश फैला तो शिक्षा ग्रहण करने वालों ने अच्छे संस्कार पैदा करने की कोशिशें की और उन्हें प्रसारित करने की भी कोशिशें की। कहना चाहूँगा कि मेरे ससुरजी के बाद की पीढ़ी के पुरूष वर्ग ने (अपनी पत्नी सहित) अपने बाद वाली पीढ़ी में अच्छे सुखद संस्कार डालने में घोर असफलता पाई जो अपेक्षाकृत ढंग से उनकी पिछली पीढ़ी ने अपनी कम शिक्षा के बावजूद (थोड़ी-बहुत मात्रा में ही सही) ख़ुद उनमें डाले थे। कारणों पर प्रकाश डालने से चूंकि सिवाय रिश्तों में खटास आने के और कुछ न होगा ( और उसकी कोई आवश्यकता भी नहीं है ) अतः मैं उससे परहेज कर रहा हूँ । फ़िर भी इतना कहने से नहीं चूकूँगा कि ससुरजी की लड़कियों की शादियाँ अपेक्षाकृत ढंग से ऊंचे शहरों में हुई और वहाँ उन्हें शहरों की आधुनिकता से परिचय भी हुआ और अपने बच्चों को आधुनिक माहौल प्रदान करने की सुविधा भी प्राप्त हुई । इस आधुनिकता का प्रवाह उनसे समय-समय पर छन-छनकर रामपुर जैसी छोटी जगह पर भी बहा , और मेरी ससुराल के उन बच्चों को धीरे-धीरे एक अजब-सी खिचड़ी-फरोश मानसिकता से लबरेज कर गया जिनमें एक तरफ़ आयातित आधुनिकता और उसकी चकाचौंध से उपजे रंगीन दिवा-स्वप्नों की बहुलता थी तो दूसरी तरफ़ था दादाजी के (यानि मेरे ससुरजी के) पुराने और सख्त अनुशासन का कड़क सन्देश जिसके तहत घर की चौखट से बाहर जाने पर सख्त मनाही थी । यदि कभी बाहर जाना होता भी था तो सख्त पहरे में । सामान्य तौर पर दुनियादारी सीखने के लिए इस दुनिया के लोगों से मिलने-जुलने, उनके दुःख-सुख में , पर्व-त्योहारों में शामिल होने , खेलने-कूदने आदि से बच्चों का मानसिक विकास होता है जिसका हमारे ससुराल में सर्वथा अभाव था । मैं नहीं समझ पाता कि ऐसे में क्या किसी भी बच्चे का कोई संगी-साथी हो पाना सम्भव रहा होगा जो उनके उम्र की एक स्वाभाविक मांग थी ? लिहाजा इस तरह के बच्चों का मानसिक विकास अपनी सहज स्वाभाविकता खो बैठे तो इसमें आश्चर्य कैसा ? वे बौद्धिक रूप से पिछड़ जाएँ तो इसमें उनका क्या कसूर ? आख़िर परिस्थितियाँ ही तो मनुष्य का अच्छा या बुरा व्यक्तित्त्व बनाती हैं ? इसी पीढ़ी की लड़की है रौशनी..... । ऊपर से उसका यह काम्प्लेक्स, यह मनोविकार, यह मनोभाव कि " मैं सुंदर हूँ।" ( कहना न होगा कि अपने इर्द-गिर्द के संसार में उसने यह भी पाया था कि पुरूष-समाज स्त्रियों की सुन्दरता को कितना ज्यादा और नाजायज महत्त्व देता है।)रौशनी की मनोविकृति को बढ़ाने वाला एक फैक्टर और है । उसके घरवालों के द्वारा उसे यह बताया गया था कि उसका पति बहुत ही जल्द उसे लेकर उस शहर में चला जायेगा जहाँ वह काम-काज करता है । यह भी कि शादी के बाद सबसे पहले तो उसका पति उसे लेकर हनीमून मनाने मलयेशिया जाएगा ।रौशनीपैसेवाले घर में शादी करने के ख़िलाफ़ थी चूंकि उसकी बड़ी बहन पैसेवाले घर में ब्याही जाकर खुशहाल नहीं थी , उसका हश्र रौशनी देख चुकी थी । अतः घरवालों के द्वारा उसको तैयार करने के उद्देश्य से ये बातें उसे बताना जरूरी समझा गया था ( मुझे मालूम हुआ है कि सचमुच में ऐसा आपलोगों की तरफ़ से लड़कीवालों को बताया गया था ) , और तब जाकर रौशनी इस शादी के लिए तैयार हुई थी । अगर यह सच है तो उसकी मनोविकृति के इस हिस्से के जिम्मेदार यकीनन आपलोग हैं - इसे आपको ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिए । और अगर यह बिल्कुल झूठ है तो इसकी जिम्मेदारी उसके मायके-पक्ष पर आ ठहरती है ।यह एक कड़वी सच्चाई है कि रौशनी हद से ज्यादा अकड़बाज़ , जिद्दी , कामचोर, बदमिजाज, झूठी और घमन्डी लडकी है। ऊपर से उसकी महत्त्वाकांक्षा अलग से है कि मेरा पति मुझको लेकर अलग रहे , घुमावे-फिराए, सिनेमा दिखावे , मेरी सुन्दरता पर कुर्बान हो जाने की भाषा बोले, मेरे आगे किसी की न सुने - और सुने भी तब जब लोग मेरे वर्चस्व को स्वीकार करें । देखा जाए तो कौन ऐसी लडकी होगी जो ऐसे सपने देखना पसन्द न करती हो । पर एक फर्क है कि जहाँ सामान्य दिमाग वाली लड़कियाँ इन सपनों से अलग की सच्चाईयों को व्यावहारिकता के तराजू पर तौलने के बाद ही ( और उनको उचित प्रधानता देते हुए ही ) ऐसे सपनों की दुनिया में विचरती हैं और इन सपनों की जितनी मात्रा तकदीर ने वास्तव में दी है उसे ही गले लगाकर सन्तुष्ट रहने का वाजिब प्रयास करती हैं, वहीं रौशनी की कहानी बिल्कुल अलग है । उसे अपने सपने पूरे के पूरे चाहिए और वह भी तुरन्त पा लेने की बेताबी के साथ। यह यकीनन मानसिक विकृति है जो इलाज की मांग करता है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि थोड़ी-बहुत मानसिक विकृति का शिकार तो आज की व्यवस्था का हर शख्स है। ख़ुद वह डाक्टर भी जो दूसरों का मानसिक इलाज करने बैठा है । तो क्या सारे लोग डाक्टर की शरण लेते हैं ? नहीं । दरअसल हमारा जो सामाजिक और पारिवारिक ढांचा है वह ख़ुद ढेर सारे मानसिक रोगों का इलाज कर पाने में सक्षम है और युगों-युगों से यह करता आया है । हमारा समाज और परिवार हर उस सदस्य की देखभाल और सुश्रुषा करता रहा है जिसे किसी भी किस्म की मानसिक सेवा की दरकार होती है और इसके लिए जो औषध कारगर है उसका नाम है --- क्षमा, सहनशक्ति, करुणा, सहानुभूति और प्रेम । हजारों भाषाओं का उपलब्ध साहित्य इसका गवाह है । एक वक्त आता ही है जब इस इलाज से रोगी रोगमुक्त होता है । आपने शायद सुना हो कि शराब की पुरानी आदत छुड़ाने वाला डाक्टर पहली प्रक्रिया के तौर पर मरीज को ख़ुद से शराब मुहय्या कराता है । फ़िर धीरे-धीरे उपर्युक्त अन्य औषधियों ( क्षमा, सहनशक्ति, करुणा, सहानुभूति और प्रेम और दवा ) के बल पर उसे पूरी तरह से स्वस्थ बनाता है । मेरी यह सोच उस समय एक वास्तविकता में बदल गयी जब मैंने ऐसी ही बातें रौशनी के मानसिक डाक्टरों ( psychiatrists ) के मुँह से सुनी । बल्कि उनलोगों का नजरिया तो यह भी रहा कि जो लड़की इतना कमजोर I. Q. रखती हो वह तो कुछ ज्यादा सहानुभूति और प्यार deserve करती है । और इसमें सबसे बड़ी भूमिका ख़ुद उसके पति की बनती है । शायद यही वजह है कि डाक्टर ने आपसे मिलने की इच्छा व्यक्त की है।एक पहलू और भी विचारणीय है। बात आपके या मेरे घर की नहीं बल्कि पूरे के पूरे भारतीय समाज की मानसिक रुग्णता की है। कोई तो कारण है कि हिंदुस्तान में " सास, बहू, देवर, भौजाई और ननद " के किस्से , फिल्में और सीरियल्स खूब चटखारे लेकर सुने और देखे जातें हैं ? इस देश की कोई-न-कोई अच्छी-बुरी परम्परा ही तो है जो इन चीजों के निर्माण की वजह बनती है और जिसमें बाकायदा रस लिया जाता है ? क्या इंदिरा गांधी से भी ज्यादा आधुनिक कोई औरत इस देश में हुई है जिनकी शिक्षा विदेशों में हुई , जिनका प्रेम-विवाह एक पारसी व्यक्ति से हुआ -- और फ़िर भी जिसने अपनी गर्भवती पुतोह को रात के डेढ़ बजे अकेली अवस्था में घर से खदेड़ दिया ? वह कौन सी मानसिकता थी ? ( यह कोई कपोल-कल्पना नहीं एक दस्तावेजी हकीकत है । )**************
( अब गिरिडीह में, यानि दिनांक 19.06.08 को )......
अपनी शेष बातों को प्रारम्भ करने के लिए सबसे पहले मैं आपकी दी हुई डायरी में छपे एक उक्ति को उद्धृत करना चाहूँगा :" The essence of intelligence is skill in extracting meaning from everyday experience. "सच ही तो कहा गया है कि हर दिन के अनुभव का अर्थ निचोड़ पाने में आपकी जो दक्षता है - दरअसल उसी में आपकी बुद्धिमत्ता अन्तर्निहित रहती है। ...... पर क्या यह बुद्धिमत्ता (intelligence) ईश्वर ने सबको बराबर मात्रा में प्रदान की है ? अगर ऐसा होता तब तो सभी व्यक्ति का I.Q. ( Intelligence Quotient ) बराबर होता । दूसरी तरफ़ क्या यह सच नहीं कि दक्षता ( skill ) ऐसी चीज है जो ईश्वर-प्रदत्त I .Q. ( कम या ज्यादा ) के बावजूद शिक्षा-दीक्षा , ट्रेनिंग और अभ्यास से कम या ज्यादा होती रहती है ? मैं कहना चाहता हूँ कि ज्यादा से ज्यादा I.Q. वाले व्यक्ति को भी यदि आवश्यक मात्रा में शिक्षा-दीक्षा , ट्रेनिंग और अभ्यास नहीं मिल पाया तो दक्षता हासिल करने के मामले में उसे बेवकूफ समझने की गलती यह समाज कर सकता है। दूसरी तरफ़ यह भी प्रायः देखने को मिल जाता है कि बहुत कम आई० क्यू० वाला एक कमजोर विद्यार्थी ( जो मामूली से मामूली बात को समझ पाने में अपने शिक्षक का पसीना गिरवा देता है ) भी अच्छे नम्बरों से परीक्षाएँ पास कर लेता है । जड़गत रूप से पाया गया कि ऐसा इसलिए हुआ कि उसके शिक्षक ने उसपर औसत से कहीं ज्यादा मिहनत की और ख़ुद उससे भी जी-तोड़ अभ्यास (परिश्रम) करवाया ।यानि ईश्वर-प्रदत्त I. Q. एक अलग चीज है और यद्यपि यह दक्षता-प्राप्ति के प्रतिशत को ( व गति को ) प्रभावित अवश्य करती है तथापि दक्षता एक अलग चीज है । हाँ, यदि आई० क्यू० बिल्कुल ही जीरो हो तब तो दक्षता भी निस्संदेह जीरो ही होगी -- चाहे उसपर लाख परिश्रम ( ट्रेनिंग देने व अभ्यास करवाने का ) क्यों न किया जाय । पर ऐसा, यानि जीरो आई० क्यू० का होना, तो सिर्फ़ " पागलों " के साथ ही होता है । रौशनी " पागल " नहीं है --- उसका I. Q. जीरो नहीं है । यानि औसत से ज्यादा प्रयास करके उसे सामान्य किस्म की दक्षता हासिल करवाई जा सकती है जो मानव-जीवन व्यतीत करने के लिए जरूरी हो । पर हाँ, इसके लिए उसके हर पारिवारिक सदस्य को धैर्यपूर्वक उसे SUPPORT करना पड़ेगा । यथेष्ट श्रम करके उसको प्रेमपूर्वक अभ्यास कराना होगा , ट्रेनिंग देनी होगी । और इस तरीके से जितना वह हासिल कर पाये उससे सन्तोष करना पड़ेगा । ( जाहिर है कि पारिवारिक सदस्यों से मेरा आशय उसके मायके वाले लोग नहीं बल्कि उसके ससुराल वाले सदस्य हैं चूंकि शादी के बाद उसका परिवार उसका मायका नहीं बल्कि उसकी ससुराल है।) आवश्यक मात्रा में ट्रेनिंग न दे पाने की एवं अभ्यास न करवा पाने की आपके हिस्से की इस मजबूरी के लिए भी आपको सन्तोष कर लेना पड़ेगा ।विश्व-विख्यात उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे की नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत पुस्तक " समुद्र में खोया हुआ आदमी " का नायक एक जगह कहता है -- " मैं ईश्वर की कृति हूँ । मेरे पास अदम्य साहस है। तुम मेरे शरीर को तो मार दे सकते हो, पर याद रखो कि तब भी तुम मुझे हरा नहीं सकोगे। " यह कथन हर संघर्षशील व्यक्ति में, जिसका कोई-न-कोई निर्धारित लक्ष्य होता है, ऊष्मा जगाती हैं कि तुम अजेय हो - तुम्हें कोई पराजित नहीं कर सकता । यह भी कि तुम अपने पथ पर आगे बढ़ते रहो , इसकी निरन्तरता में कोई कमी न आने दो । " गीता " का सन्देश भी तो यही है कि तुम अपने लक्ष्य का निर्धारण करके बढ़ते चलो ---- यह तय करना तुम्हारा नहीं ईश्वर का काम है कि तुम्हारे संघर्षों के लिए वह तुम्हें कब, किस मात्रा में और कैसा फल देता है।रौशनी के मामले में कोशिश करते रहना आपसे हार नहीं मानने की मांग करता है --- ईश्वर की दी हुई हर अच्छी-बुरी चीज पर सन्तोष करना ही उसके प्रति (यानि ईश्वर के प्रति ) श्रद्धा व विश्वास को प्रदर्शित करता है । और अगर आप असन्तुष्ट हैं तो याद रखें कि आप एक तरह से ईश्वर के फैसले को चुनौती दे रहे हैं , उससे बगावत कर रहे हैं ----नास्तिकता को आमन्त्रण दे रहे हैं ।
आपको एकबार फ़िर से मैं अपनी जिन्दगी के उसी ख़ास पन्ने पर ले जाना चाहूँगा जिसका जिक्र मैं ऊपर कर चुका हूँ । मैं कह चुका हूँ कि सात साल के वैवाहिक जीवन का आत्म-निर्वासन मैंने भोगा था और जिसके लिए मैं मानता हूँ कि उसमें मेरी ही गलती थी । मैं ऐसा क्यों मानता हूँ ? ज़रा विश्लेषण करके आपको बताऊँ। मनोवैज्ञानिक लोग यह मानते हैं कि जबतक लड़का या लडकी विवाह के लिए मानसिक तौर पर परिपक्व न हों तबतक उनकी शादी नहीं होनी चाहिए । प्रश्न है कि यह " मानसिक तौर पर परिपक्व होना " क्या चीज है ? इसे ज़रा बारीकी से समझने की जरूरत है ।मेरे बैंक में एक दिन एक लड़की आई । मारवाड़ी लड़की थी । पहले भी यदा-कदा बैंक में आती रहती थी । उसका हमारे बैंक में एक F. D. और एक R. D. एकाउन्ट था । उस दिन उसे एक ड्राफ्ट बनवाना था । हमें मालूम था कि वह एक गरीब परिवार से है , ट्यूशन पढ़ाकर गुजारा करती है। उसके घर पर एकाध सदस्य ही हैं । हमारे स्टाफ में से किसी ने उससे पूछ लिया ( यद्यपि पूछने का कोई उद्देश्य न था , बस यूँ ही ) कि वह किस काम के लिए ड्राफ्ट बनवा रही है । दुर्गा ने उत्तर दिया ( उसका नाम दुर्गा था ) , " मेरी शादी हो रही है , उसी के लिए एक काम है।" हम दंग रह गए , उसके स्वर में प्रसन्नतासूचक गम्भीरता थी और शर्म नाम की कोई चीज नहीं थी । गप-शप जारी रहा । आत्मीयता के साथ उसने बहुत सारी बातें बताई । अपनी वास्तविक गार्जन वह ख़ुद ही थी -- यद्यपि वैवाहिक विधियों के लिए उसने अपने किसी सम्बन्धी को बुलवा लिया था ( उसके पिता नहीं थे )। हमारे सारे स्टाफ ने उसे अपनी शुभ-कामनाएं दीं । उसकी उम्र 27-28 वर्ष से हरगिज कम न होगी । कहना न होगा कि दुर्गा की यह बातचीत ख़ुद-ब-ख़ुद बयान कर देती है कि उसने सही अर्थों में विवाह करने की मानसिक परिपक्वता को प्राप्त कर लिया था।मैं समझता हूँ कि यद्यपि दुर्गा की यह मानसिक परिपक्वता उसकी उम्र के 27-28 वें वर्ष में दिखाई पड़ी तथापि इसे " उम्र " से जोड़ कर देखना सही न होगा । कहीं यह परिपक्वता कम उम्र में ही प्राप्त हो जाती है और कहीं ज्यादा उम्र में भी इसके दर्शन नहीं होते । औरत की मानसिक अपरिपक्वता से सम्बन्धित यह दृश्य देखें --- मियाँ-बीबी की एक जोड़ी है । दो-चार बाल-बच्चे भी हो चुके हैं । पर बीबी है कि यदि मियाँ कहीं से आ गए तो खट से घूंघट तान लेती है । अथवा किसी बुजुर्ग की उपस्थिति में मियाँ कहीं से अचानक आ गए तो बीबी खट से घूंघट तान लेती है । अब ज़रा मर्द की मानसिक अपरिपक्वता से सम्बन्धित भी एक दृश्य देख लें --- बीबी को बुखार है , शरीर तप रहा है । घर में ऐसी व्यवस्था है कि खाना पकाने वाले दूसरे लोग मौजूद हैं , नौकर-चाकर भी हैं -- पर यदि उसने (यानि बीबी ने) रसोईघर में प्रवेश नहीं किया है , हाथ नहीं बँटा रही है तो टीका-टिप्पणी चालू होती है । कुछ इस तरह से -- " ऐसा भी क्या आफत टूट पड़ा है , ज़रा-सा शरीर ही तो गर्म हुआ है । अपना मायका होता तो भले ही गदहे की तरह खटती रहती , यहाँ देखो तो ज़रा-ज़रा सी बात पर सीधे बिस्तरे में घुसी रहती हैं।" बीबी के मियाँ ये सब बड़े आराम से चुपचाप सुन रहे हैं । कोई विरोध की लहर नहीं, बीबी के प्रति सहानुभूति की कोई आवाज़ नहीं । डर क्या है ? लोग कहेंगे कि जुम्मा-जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुआ बीबी ने गुलाम बना रखा है । ऐसे लोग बड़ों के सामने कभी बीबी को उसके नाम तक से नहीं पुकारते -- प्यार से बतियाना तो दूर उससे नॉर्मल ढंग से बातचीत करने तक से परहेज करते हैं । बच्चे हो गए हों तो बड़ों के सामने कभी उसे गोद तक नहीं लेते ( अकेले में भले उसे चाहे जितना प्यार-दुलार कर लें )। उनका ख़ुद को दिया गया तर्क होता है -- लोग क्या कहेंगे ? यदि मियाँ जी बेरोजगार हैं तब मुसीबत ज्यादा बड़ी है और यदि कमाऊ हैं तो अपनी शराफत के चोले में उनका तर्क जो वो ख़ुद को देते हैं वह यह होता है कि -- क्या घरवाले यह नहीं सोचेंगे कि कमाने लगा है न, इसीलिये बड़ा बीबी वाला बना फिरता है !मेरी नजर में ऐसे लोग नौटंकीबाज कहे जा सकते हैं। पर, जड़ में वही बात है कि ये दृश्य दरअसल उनकी उसी मानसिक अपरिपक्वता को दर्शाते हैं जिसके तहत उनकी शादी हुई। (यहाँ यह बात बिल्कुल महत्त्वपूर्ण नहीं है कि उनकी शादी उनकी अपनी मर्जी से हुई या घर वालों की मर्जी से । दोनों ही हालतों में महत्त्वपूर्ण बिन्दु सिर्फ़ यह है कि वे अभी शादी करने के लायक परिपक्व नहीं थे।) ऐसे लोग बिना रीढ़ की हड्डी वाले , काल्पनिक दुनिया में जीने वाले मन से कमजोर लोग हैं जिनके लिए जिम्मेदारी से ज्यादा बड़ी चीज उनकी " छवि " यानि इमेज होती है जिसके बारे में उन्हें अपनी खयाली दुनिया में लगता रहता है कि " यह इमेज बस अब टूटने ही वाली है "। कहना न होगा कि ऐसे लोग दुर्गा जैसी बहादुर लडकी के ठीक विपरीत होते हैं जिसने दुनिया वालों की ठोकरें खा-खाकर ख़ुद को जब मजबूत रूप से मानसिक स्तर पर विवाह के लिए परिपक्व व तैयार पाया तभी शादी का फैसला लिया, यह फैसला ख़ुद से लिया और इस फैसले को दुनिया वालों के सामने आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास और गम्भीरता के साथ प्रस्तुत करने में किसी लाज-संकोच या लाग-लपेट का सहारा हरगिज नहीं लिया ।....... तो बगैर किसी हिचकिचाहट के - उम्र की इतनी सीढीयाँ तय कर लेने के बाद आज मैं यह कह सकता हूँ कि उस समय जब मैं दाम्पत्य-जीवन के मामले में सात साल का आत्म-निर्वासन भोगते हुए बाकायदा " सुख " की अनुभूति कर रहा था, जब मैंने माता-पिता से वह चाहा जो मिला नहीं और जब बीबी से भी वह चाहा जो मिला नहीं तो दरअसल कोई और नहीं मैं ख़ुद ही ग़लत था । मैं उस समय बिना रीढ़ की हड्डी और काल्पनिक दुनिया में जीने वाला एक कमजोर इन्सान था जो दुर्भाग्य से ख़ुद को बहुत शूर-वीर समझता था, चूंकि मेरी गुस्सैल प्रकृति के कारण लोग मुझसे एक हद तक परहेज भी करते थे और मन ही मन डरते भी थे। जड़ में वही बात थी कि जमाने की नजरों में मेरी इमेज जो "श्रवन कुमार" की बन चुकी थी उसमें कहीं धब्बा न लग जाए। यह स्थिति दरअसल और कुछ नहीं बल्कि मेरा मानसिक दिवालियापन ही था जिसकी जड़ में वही मानसिक अपरिपक्वता वाली बात थी ।
एक बचकाना नजारा और देख लीजिये । अपने माँ-बाप से जो चाहत मैं रखता था ( यानि मैं तो अपनी बीबी में खोट निकालता फिरूँ , उसे लतियाता रहूँ और बदले में उनलोगों के मुँह से अपने लिए "श्रवन कुमार की जय हो " के मौन उदघोष को महसूस करता रहूँ , पर वे मेरे लिए जरूर ऐसी सुन्दर व्यवस्था कर दें कि मेरी पत्नी स्वतः मेरे समीप आ जाए । यानि वे अपना "कड़क" आदेश मुझको दें और मुझे "मजबूर" कर दें कि मैं उनके आदेश से अपनी पत्नी के करीब आ जाऊँ ), मैंने बताया है कि वैसा पाने में मैं पूरी तरह विफल रहा था । उसी दौर की एक जरूरी बात , पर हाँ, बड़ी ही बचकानी बात । अपने माता-पिता से अपनी अघोषित चाहत प्राप्त करने के लिए मैंने एक अनोखी कोशिश , एक अनूठा प्रयोग किया । हमारे पारिवारिक डॉक्टर की एक आधुनिक-ख्यालों वाली हमउम्र लड़की थी । मैं बाकायदा प्लान बनाकर उसके नजदीक आना शुरू किया । हमलोग रोज रात के बारह-एक बजे तक कैरम-बोर्ड खेलते थे । उसके बाद ही मैं घर लौटता था । मेरी आदर्श विचारों और आधुनिक ख्यालों वाली छवि से उसके माता-पिता बहुत प्रभावित रहते थे और उन्हें इस मेल-जोल पर कत्तई आपत्ति न थी । मेरा उद्देश्य बिल्कुल साफ़ था कि जब इससे मोहल्ले में मेरी बदनामी होने लगेगी तब जरूर मेरे माँ-बाप को धक्का-सा लगेगा और वे इसे रोकने के लिए जरूर ही कुछ इस तरह का अपना "कड़क" आदेश देंगे कि --- यह क्या तमाशा तुमने लगा रखा है ? अपनी पत्नी को एडजस्ट करो , चाहे जैसे हो । शादी कोई मजाक नहीं है । अपनी जिम्मेदारी को समझो , यह जंगल नहीं समाज है । जब शादी हमने सही-ग़लत जगह कर ही दी है तो समाज के नियमों का पालन करो और उसे एडजस्ट करो क्योंकि अब कोई दूसरा रास्ता नहीं है । समाज में हमारी जो इज्जत है , उसमें बट्टा मत लगाओ । और याद रखो हमारे जैसे संस्कार हैं कि हम तुम्हें कोई भी ग़लत काम करने की इजाजत नहीं देंगे । और इस तरह से मेरी पत्नी के साथ मेरा ऑटोमेटिक एडजस्टमेंट शुरू हो सकेगा । पर इस बचकानी हरकत में भी मैं विफल रहा क्योंकि जो हुआ वह बिल्कुल उल्टा था । मैं तो खैर बदनाम हुआ ही , वह बेचारी लड़की भी खामख्वाह बदनाम हुई और इस सबके बावजूद मैं अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुआ । हुआ असल में यह कि जब समाज के लोग मेरे पिता के पास इस मसले के साथ पहुंचे तो मेरे पिता ने , जो एक दबंग व्यक्तित्त्व के स्वामी थे , उन्हें दो-टूक उत्तर देकर चलता कर दिया --- जिसका आशय यह था ----कि जा-जा कहीं दूर जा के बैठ । मेरा बेटा कभी कोई ग़लत हरकत नहीं कर सकता और न ही वह लड़की ही ग़लत है । तुम साले ख़ुद चूंकि बैकवार्ड दिमाग के लोग हो इसलिए तुम्हें हर बात ग़लत लगती है । ये सारी घटनाएँ और कुछ नहीं मेरी मानसिक अपरिपक्वता के ही नमूने हैं जो इस बात की माँग करती हैं कि उस समय मेरी शादी नहीं होनी चाहिए थी ।
अब ज़रा मामले के व्यावहारिक पक्ष पर भी गौर करें । जब सात साल बाद मैंने अपनी पत्नी को एडजस्ट करना शुरू किया ( जिसकी पृष्ठभूमि मैं बता चुका हूँ ) तब जानते हैं क्या चमत्कार हुआ ? मैंने सीधे-सादे शब्दों में सच्चाई को गले लगाना शुरू किया । यानि पहले कदम पर तो "श्रवन कुमार" का चोला मन के अन्दर से उतार फेंका और दूसरे कदम पर यह किया कि अपनी पत्नी से सामान्य बातचीत शुरू कर दी । बेहिचक स्वीकार करता हूँ कि ऐसा करने में मुझे पहले मन को मजबूत बनाने का थोड़ा-बहुत अतिरिक्त प्रयास जरूर करना पड़ा पर कुल मिलाकर यह काम कुछ कठिन न था । अब घरवालों की क्या प्रतिक्रिया हुई उसपर आता हूँ । एकाध दिन मुझे लोगों की "अजीब निगाहों" का सामना तो जरूर करना पड़ा पर जैसे ही उन "अजीब निगाहों " को लगा कि अपने व्यवहार में मैं काफी गम्भीर हूँ और --- उनके उकसावे के बाद भी --- एक शब्द तक अपनी पत्नी के ख़िलाफ़ नहीं बोल रहा हूँ तो वे "अजीब निगाहें " अपने-आप खामोश हो गईं । एकाध बार जब बड़ी हिम्मत के साथ मैंने अपनी पत्नी के पक्ष में कोई वाक्य कह डाला तब तो मानों सचमुच "चमत्कार" ही हो गया । वह यूँ कि उन "अजीब निगाहों" में अब "अजीब" कुछ नहीं रहा बल्कि एक तरह के "मौन समर्थन" का भाव दिखाई पड़ने लगा ।
दरअसल इतना कुछ गवाँ देने के बाद ही मैं सीख पाया कि कोई भी माँ-बाप, भाई-बहन, आपका कोई भी अपना ( बिल्कुल सगा ) कभी भी आपका बुरा नहीं चाहते , बुरा नहीं सोचते । वह तो सदियों से चली आ रही हमारी सड़ी-गली हिन्दुस्तानी परम्परा अपना रंग दिखलाती है जिसमें लड़के के प्रति उस जुडाव में --- जो उसके हर नजदीकी "सगा" का होता है --- तब एक व्यवधान आ जाता है जब लड़के के जीवन में एक नए सदस्य -- उसकी पत्नी -- का आगमन होता है । सोचकर देखें तो पायेंगे कि इस हिन्दुस्तानी मिट्टी में ही ऐसा कुछ ख़ास है कि इस नए सदस्य के आगमन में हर "सगा" ख़ुद को किसी-न-किसी सीमा तक मानसिक रूप से "पराया" समझने लगता है । और यही वह वजह है कि अपने "सगेपन" की उष्णता को जिन्दा रखने के प्रयास में खाम-खाह अपने "वर्चस्व" को जाने-अनजाने प्रदर्शित करता रहता है जिस वजह से एक फिजूल की मनोवैज्ञानिक टकराहट उत्पन्न होती है । अगर लड़का मानसिक रूप से परिपक्व है तो यह टकराहट स्वतः कुछ दूर जाकर लुप्त हो जाती है --- उस " नए आगमन " को गले लगा लेती है । पर यदि उसने " श्रवन कुमार " जैसी कोई नादानी दिखाई तो यह टकराहट बढ़ती चली जाती है । मजेदार बात है कि इसका इलाज बहुत सरल है । थोडा-सा मुखर होकर पत्नी के प्रति सार्वजनिक रूप से अपनत्व और आत्मीयता दिखाई जाय तो हर कोई ख़ुद-ब-ख़ुद इस टकराहट को ख़त्म कर सकेगा । और हाँ, अपनत्व और आत्मीयता के इस प्रदर्शन में भूल से भी कभी अपनी जुबान पर अपने और अपनी पत्नी के बीच के किसी भी मतान्तर को उजागर नहीं किया जाए । ऐसा कोई मतान्तर अगर है तो उसे पति -पत्नी अलग से नितान्त अकेले में आपस में ही निपटावें ---- उसकी सार्वजनिक प्रस्तुति अभिन्न से अभिन्न मित्रों के बीच भी हरगिज नहीं की जाय । जान से भी प्यारा एकाध मित्र अगर है -- जिसका किसी भी किस्म का कोई भी प्रत्यक्ष या परोक्ष स्वार्थ उससे नहीं हो सकता --- तो भले सुझाव लेने की गरज से उससे अकेले में चर्चा की जा सकती है ।......
सिर्फ़ उदाहरण देने की गरज से याद दिलाऊँ कि जिस दिन आपकी बहन गायत्री देवी हमलोगों के सामने ( यानि रौशनी के मायके वालों के सामने ) रौशनी को चप्पल उठाकर मारने वाला वाक्य बोली थीं तो उस समय आपकी चुप्पी सरासर नाजायज थी ।रौशनी की कोई बात लाख झूठी थी , गायत्री जी का वाक्य उनकी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं तो और क्या था ? पर हाँ , याद रहे कि ऐसा सदियों से आपके और हमारे जैसे हजारों-लाखों परिवारों में होता आया है जिसकी प्रशंसा यद्यपि नहीं की जा सकती, तथापि हमारी हिन्दुस्तानी मिट्टी में व्याप्त इस कोढ़ को नजर-अंदाज नहीं करना भी तो बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती । ( आख़िर इन्दिरा गाँधी तक का परिवार इससे अछूता नहीं रहा था जिसके कारणों का उल्लेख मैं ऊपर कर चुका हूँ । ) क्या सुबह के भूले के लिए सारे रास्ते एक झटके में ही बन्द कर दिए जाने में कोई बुद्धिमानी है , शाम का इन्तजार न किया जाए ?
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । यह बात हमने किताबों में तो खूब पढ़ी है । पर इस बात का अर्थ असल में समझा है क्या ? मेरी समझ से तो इसका अर्थ यह है कि मनुष्य जंगली प्राणी नहीं है, वह समाज में रहता है। उसे जंगली प्राणियों जैसी आजादी नहीं होती। समाज में रहने के लिए उसे समाज के बनाए हुए नियमों का पालन करने की अनिवार्यता होती है। प्रश्न उठता है क्यों ? वह इसलिए कि समाज सुचारू रूप से चल सके । और " परिवार" इसी समाज की एक इकाई को ही तो कहते हैं। दुनिया के हर हिस्से में, हर धर्म में " विवाह " का प्रावधान है । क्यों ? इसलिए कि समाज में व्यभिचार न फैले। इसी सिद्धान्त ने " रिश्तों " को जन्म दिया, " परिवार " को जन्म दिया । जाहिर है कि विवाह कोई गुड्डे-गुड्डियों का खेल नहीं । हर छोटी-बड़ी बात पर बच्चों के द्वारा गुड्डे-गुड्डियों के " विवाह " को कौन कहे , ख़ुद गुड्डे-गुड्डियों को ही तोड़-मरोड़ कर फेंक देना एक आम दृश्य है जो हर गली-मोहल्ले में देखा जा सकता है । पर बड़ों के मामले में तो यह एक गम्भीर सामाजिक अनुशासन है जिसका पालन हर मनुष्य को करना ही पड़ता है । " विवाह" होने के पहले दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को चाहे जितना चाहें, जाँच-परख लें तभी " विवाह " जैसे अटूट बन्धन में एक-दूसरे को डालें, क्योंकि सैद्धान्तिक रूप से तो इस बन्धन को " अटूट" ही स्वीकारा गया है। और यही वह वजह है कि दुनिया के हर देश में -- हर धर्म के लिए, हर जाति के लिए -- कमो-बेश रूप में " विवाह-बिच्छेद " को हर-सम्भव तरीके से रोकने की कोशिश की गयी है और यहाँ तक कि क़ानून का भी सहारा लिया गया है । अदालतों में " विवाह-बिच्छेद " के जिन मामलों को गम्भीर मानते हुए विचारार्थ सुनवाई हेतु रखा भी जाता है उन मामलों में भी दोनों पक्षों को इस सुनवाई से पहले अनिवार्य रूप से छः महीनों का "अलग-अलग रहने" का प्रावधान बनाया गया है ( जिसे "JUDICIAL SEPARATION " कहते हैं), जिसका उद्देश्य भी कानून की किताबों में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है। वह यह है कि दोनों पक्ष अलग-अलग रहते हुए एक बार फ़िर से गम्भीरतापूर्वक, लगातार छः महीनों तक, यह पुनर्विचार करते रहें कि क्या अब सचमुच एकसाथ रहने की कोई भी गुंजायश नहीं रह गयी है ? क्या वैवाहिक सम्बन्धों की पुनर्स्थापना की कोई भी कोशिश एकबार और नहीं की जा सकती ?
आपने बार-बार कहा है कि आप किसी भी हालत में DIVORCE नहीं चाहते । लेकिन आज आपने अपनी जुबान से फिरते हुए उसी दुनिया का एक अन्य जुमला " MUTUAL" ( आशय "MUTUAL SEPARATION" से था) का प्रस्ताव दे डाला । और आपने इसका आधार क्या सुनाया ? रौशनी के डाक्टरी रिपोर्ट का आपके द्वारा अन्य डाक्टर को दिखाया जाना और उस डाक्टर का यह बताया जाना कि यह लड़की कुदरती तौर पर ही कमजोर आई० क्यू० की लड़की है ( जिसके साथ निर्वाह नहीं किया जा सकता ) । किसी भी डाक्टर ने निर्वाह नहीं की जा सकने वाली बात अगर कही भी है ( उस डाक्टर की योग्यता पर फिलहाल बगैर उंगली उठाये ) तब भी कहना चाहूँगा कि शादी के बाद अगर कोई पत्नी अपाहिज हो जाए तो क्या ऐसी कोई सामाजिक परम्परा है कि उसे DIVORCE करके या MUTUAL SEPARATION करके छोड़ दिया जाए ? रौशनी के मामले में क्या हुआ ? क्या कोई भी माँ-बाप अपने बच्चों का I. Q. जांच करवाए फिरता है ? यदि रौशनी के कमजोर I. Q. होने का पता उसकी शादी के बाद चला , एक बच्चे को जन्म देने के बाद चला , तो क्या यह मामला ठीक उसी तरह का मामला नहीं हुआ जब कोई लड़की शादी के बाद रोगग्रस्त होकर अथवा दुर्घटनाग्रस्त होकर अपाहिज हो जाए ? तो क्या ऐसे मामले डाईवोर्स या मुचुअल सेपरेसन की माँग करते हैं और क्या यह समाज में प्रतिष्ठित ढंग से स्वीकार्य होगा ? कहीं ऐसा तो नहीं कि सामाजिक अनुशासन की कसौटी पर खोटा पाया जाकर उल्टे इसकी निन्दा होगी ? रमेश बाबू , इसी स्टेज पर फ़िर से याद दिलाऊँ कि गुड्डे-गुड्डी के खेल में और वास्तविक जीवन में फर्क होता है । मानवीय परेशानियों , उलझनों और तनावों की महत्तम मात्रा में से गुजरने के बावजूद जिन्दगी को इतने हल्के ढंग से नहीं लिया जा सकता । तब सामाजिक नियमों को बनाए जाने की ही आवश्यकता क्या थी और उनका मनुष्य के द्वारा पालन करवाए जाने की अनिवार्यता भी आख़िर क्यों थी ? स्पष्ट कहना चाहूँगा कि यह स्थिति दुर्भाग्य के तौर पर सहन करने वाली चीज है-- बेहतरी के लगातार प्रयासों के साथ-साथ। यदि इसके लिए उसके माता- पिता को दोषी ठहराया जाय तो ग़लत होगा । क्योंकि, तब तो आपको भी इसके लिए दोषी क्यों न ठहराया जाए कि ख़ुद आपने रौशनी को न सिर्फ़ उसकी सुन्दरता के लिए पसन्द किया बल्कि उसके साथ लगातार मोबाइल पर वार्ता जारी रखने के बावजूद कभी यह ताड़ नहीं पाये कि उसका आई० क्यू० इतना कमजोर है ? उतना ही क्यों , आप तो एक बच्चे के पिता भी बन गए । उसके पहले ही क्यों नहीं जान लिया कि यह लड़की इतनी कमजोर आई० क्यू० की लड़की है, और आगे चलकर इसके साथ आपका निर्वाह नहीं होगा ?आप अबतक एक तरफ़ " DIVORCE" की किसी भी सम्भावना को सिरे से नकारते रहे थे परन्तु दूसरी तरफ़ आज आपकी जुबान पर " MUTUAL " शब्द का प्रस्ताव आ गया। ( माना कि "MUTUAL SEPARATION " और " DIVORCE " शत-प्रतिशत एक ही चीज नहीं है पर दोनों का अन्तिम उद्देश्य आख़िर विवाह-विच्छेद ही तो है?) तो आपके ही द्वारा सुझाए गए रास्ते पर और आपकी प्रारम्भिक दौर की हम-कदमी के सान्निध्य में इतने कदम बढ़ा लेने के बाद ( यानि रौशनी का इलाज साइकियाट्रिस्ट से करवा देने के बाद ; जिसकी थोड़ी-बहुत प्रक्रियाएं ही अब बाकी रह गयी हैं , जिनमें डाक्टर की सलाह के मुताबिक आपका उनसे मिलना भी एक है ) अब आपकी जुबान पर इस MUTUAL शब्द के आ जाने से आपका आशय क्या है ? यही न कि " बाबा, कुछ ले-देकर मेरा पिण्ड छोड़ दो " ? ईश्वर करे कि आपकी मंशा यह न हो पर वक्त के इतने लम्बे अन्तराल और गुजरती जा रही परिस्थितियों की जिस सीढ़ी पर खड़े होकर आपकी जुबान से यह शब्द निकला है उससे झलकता तो यही है । और जो झलकता है दुर्भाग्य से उसका गम्भीर विशेषार्थ यह है कि आपने शादी नहीं, शादी के नाम पर व्यभिचार किया है । और " कुछ ले-देकर " दरअसल आप अपने अगले व्यभिचार की जमीन तैयार कर रहे हैं । वैसी अवस्था में, सभ्य समाज में यह कितना घृणित कदम माना जा सकता है, ज़रा अपने मित्रों से और गम्भीर शुभचिन्तकों अथवा विचारकों से पूछकर देखिये। एक बात रौशनी के मायके वालों की ओर से स्पष्ट कर दूँ । यदि आपने SEPARATION के लिए ठान ही लिया है तो संस्कार-जन्य साफगोई, जिसका आधार रौशनी के मायकेवालों का आत्म-सम्मान है, सुनने का भी धैर्य रखिये ... " एक लाल पैसा लिए बगैररौशनीको उसका मायका-पक्ष जीवन-भर बिठाकर खिला लेगा । हाथ जोड़कर विनती है कि आप अपना पैसा सहेज कर रखिये यह आपके किसी-न-किसी काम आ ही जायेगा । हाँ, बच्चे का क्या करना है यह जरूर बता दीजिये -- उसे उसका गरीब ननिहाल पालेगा-पोसेगा अथवा रौशनी उसे आपकी झोली में डालेगी ? "इसी जगह आपको याद दिलाना चाहूँगा कि आपने डाक्टर दिखाने के अपने प्रस्ताव के पक्ष में यह कहा था कि यदि उसकी कोई बीमारी निकलेगी तो उसका इलाज हो जायेगा और थोड़ी-बहुत कमी अगर रह भी गयी तो बीमारी के आधार पर अपने घरवालों पर आवश्यक मात्रा में दवाब बना पाऊँगा कि ऐसी हालत में उसके प्रति सहानुभूति दर्शाना आवश्यक है । यह भी कहना चाहूँगा कि अभी-अभी (यानि आगरा के इलाज के अतिरिक्त) आप तो उसे बेहतर इलाज के लिए पहले पूना और फ़िर हैदराबाद ले जाने वाले थे। तो बतायें कि अब क्या हो गया ? आपने बताया है कि आप वर्तमान इलाज के रिपोर्ट को ही तथाकथित "बड़े" डाक्टर को दिखाकर सन्तुष्ट हो गए। तो आप ही बताइये कि आपके इस रुख-परिवर्तन को क्या माना जाए? मैं इस रुख-परिवर्तन की वजह जानना चाहता हूँ और साथ ही "बड़े" डाक्टर की वह रिपोर्ट भी देखना चाहता हूँ जिसमें उसका यह नजरिया लिखा हो कि कमजोर I. Q. ( = 78 ) वाली इस लड़की के साथ आपका निर्वाह नहीं हो सकता -- और उस डाक्टर ने इसी आधार पर आपको MUTUAL SEPARATION की सलाह दे डाली है।
कई गल्तियाँ रौशनी ने नहीं की है पर उन गल्तियों के लिए आप शायद उसे दोषी समझते रहे हैं । उनमें से एक गल्ती उसके मायके-पक्ष के लोगों ने " मध्यस्थ " लोगों के अनुमोदन से की जिसके लिए उनके पास एक गम्भीर कारण भी है। ( सारे जमाने की राय के विपरीत मैं उस बात को एक "गल्ती" ही मानता हूँ --- पर रौशनी की नहीं। ) आपकी इच्छा थी कि बच्चा गिरा दिया जाय । शायद रौशनी की भी मंशा यही थी । पर, भविष्य के सम्भावित "अनर्थ" को ध्यान में रखते हुए ( कि भविष्य में बच्चा होने से सम्बन्धित ढेर सारी स्वास्थ्य-गत समस्यायें आ खड़ी होंगी -- जच्चा / बच्चा दोनों ही से जुड़ी हुई ) उसके मायके पक्ष वालों ने आपकी मर्जी नहीं चलने दी ; फल यह हुआ कि आपकी नजरों में गुनहगार रौशनी हुई । ज़रा ठंडे दिमाग से सोचकर देखें कि क्या अपने बड़ों के आदेश के ख़िलाफ़ चल पाना उसके लिए सम्भव या उचित रहा होता ?एक और गल्ती, जो रौशनी की मानी जाती रही है, दरअसल उसकी नहीं है । कई बार घर के बड़े-बुजुर्ग भी बच्चों जैसी नादानियाँ कर जाते हैं । शालीनता ( DECENCY ) के नाम पर उस व्यक्ति का नाम तो बताना उचित न होगा पर यह बताना जरूरी समझता हूँ कि शादी से पूर्व पैसे की मांग वाली बात में रौशनी का अपना कोई कसूर न था । और जिस व्यक्ति का कसूर था भी --- उसका उद्देश्य रौशनी की मार्फ़त पैसे की मांग करवाया जाना हरगिज नहीं था । दरअसल रौशनी की इस नादानी भरी घोषणा के बारम्बार दुहराए जाने पर कि " मेरे होने वाले पति तो अभी से ही मेरी सारी बातें मानते हैं " के सत्यापन के तौर पर किसी बड़े ने कौतूहलवश उससे यह कहवाया था । यह सच आपको हजम हो या न हो, है यह बिल्कुल सच । इस बात की सजा अगर किसी को मिल सकती है तो उसी व्यक्ति को मिलनी चाहिए । अगर आप शालीनता के विपरीत जाते हुए उस व्यक्ति का नाम जानना ही चाहें और उसे सजा के तौर पर जमाने के सामने जलील करना ही चाहें तो मैं उस व्यक्ति का नाम तक बताने को तैयार हूँ । पर, मुझे विश्वास है कि इस प्रकरण को आप यकीनन पूरी उदारता के साथ नजरअन्दाज करने की मर्यादा रखेंगे ।इसी बिन्दु पर एक सवाल ... । क्या आपने अपनी तरफ़ से इस मामले में अपनी पत्नी की मर्यादा रखी ? आपने तो इस मामले को सार्वजनिक बना डाला ! इसकी बजाय आप उसे प्यार से डांट सकते थे, समझा सकते थे -- और दरअसल यही आपका कर्तव्य भी बनता था । तथापि यह बात यदि आपको हद से ज्यादा कचोट ही रही थी तो बिगड़ा ही क्या था, आप शौक से शादी से इन्कार कर सकते थे ? ऐसा कुछ नहीं किया आपने। मानवीयता दिखाने का यदि उस समय इतना ही दम-ख़म था आपमें, तो बताइये --- इतनी बेदिली अब क्यूँ , इतनी बेरुखी अब क्यूँ ?
आपने कहा कि आपके दोस्तों के बीच हर पाँचवाँ टॉपिक आपकी शादी की असफलता का होता है । आपकी बड़ी बदनामी हो रही है । मैं आपके उन्हीं घनिष्ट मित्रों से मिलकर उनसे पूछना चाहता हूँ कि आपके वैवाहिक जीवन की "असफलता" की जानकारी उन्हें दी किसने ? जाहिर है कि स्वयं आपने । अब आप स्वयं से पूछिए कि वैवाहिक जीवन के चर्चे जब आप ख़ुद उनसे करेंगे तो वे अपनी अच्छी-बुरी टिप्पणी क्यों न करेंगे ? कितनी अजीब बात है कि आपने अपने वैवाहिक जीवन की अच्छी-बुरी गम्भीर अंतरंगता को ख़ुद से " घर की चौखट " से बाहर निकाला ( मानों वह कोई व्यापारिक मामला हो या दुनियादारी के अन्य रंगों --- युवावस्था की जायज-नाजायज रंगीनियों के वास्तविक अथवा काल्पनिक चर्चों समेत ---से जुड़ा कोई मामला हो ) और जब बाहर के लोग स्वाभाविक रूप से उसमें रूचि लेने लगे तब आपको उससे तकलीफ होने लगी ।मैं तो यही नहीं समझ पा रहा हूँ कि MUTUAL SEPARATION से आपकी यह " बदनामी " ख़त्म कैसे हो जायेगी ? मेरी समझ में तो " बदनामी " की असल शुरुआत ही इसी स्टेज से होगी । आपको मेरा यह खुला न्योता है कि आप मुझको अपने दोस्तों से मिलवा दें और उनके समक्ष मुझे ये सारी बातें ( जो पत्र के रूप में मैं आपके सामने रख रहा हूँ ) रखने की आज़ादी दें और तब मैं आपके उन्हीं दोस्तों से पूछूँगा कि ऐसी परिस्थितियों में इस समस्या का इलाज क्या सचमुच MUTUAL SEPARATION ही है ? और इससे आपकी बदनामी रुक जाने वाली है या बढ़ जाने वाली है ? यदि वे कह दें कि इससे आपकी बदनामी रुक जायेगी तो बेशक आपका व उन तमाम लोगों का जूता और मेरा सिर । इतना ही नहीं आप सभी मेरे नाम पर चाहें तो कुत्ता भी पोस लें और उसे रोज सुबह-शाम सौ जूते लगावें ।
आप बराबर कहा करते थे कि लोग समझते नहीं हैं , मैं तो सिर्फ़ इसलिए TERROR CREATE करता रहता हूँ ताकि रौशनी डर से ही सही , लाइन पर आ जाए ---- सो वह तो अब स्पष्ट हुआ कि इसमें आप असफल हो गए । तो अब एकबार ज़रा मेरे कहने से प्यार-दुलार का फार्मूला आजमाकर तो देखिये, मन पर पत्थर रख कर ही सही । दाम्पत्य-जीवन में खोने के लिए अब आपके ही कथनानुसार बचा क्या है ? आपने ही बताया, आप जीरो स्टेज तक पहुँच चुके हैं । तो अब और कुछ खोना तो बचा नहीं , सो जो भी बचा है जितना भी बचा है, वह पाना ही पाना तो है ? अतः एकबार लात-जूतों की बजाय प्यार-दुलार का अन्तिम फार्मूला भी आजमाकर देख लें । जितना भी बच पायेगा वह जीरो स्टेज से कुछ-न-कुछ ऊपर का ही तो बचेगा ? इस प्यार-दुलार और समझाने की दुनिया में ख़ुद को एक मनोचिकित्सक की तरह व्यवहार करने की कला आपको सीखनी पड़ेगी --- जिसमें जरूरत पड़ने पर प्रेम-भरे थप्पड़ों का प्रयोग भी एक कारगर दवा का काम करेगा । सख्त प्रशासन का तरीका हर जगह एक जैसा कारगर नहीं होता । जब आप भरपूर प्यार देंगे तो दुलारभरी थप्पड़ तो जानवर को भी गुलाम बना देती है । सोचकर देखें आख़िर कुत्ते-बिल्ली और हाथी-घोड़े जैसे जानवरों को भी तो लोग इसी धरती पर ट्रेनिंग देकर उससे इच्छित फल प्राप्त करने में सफल होते हैं ? आख़िर कैसे ? इस कला को सीखना होगा -- सीखना ही होगा । आपने अपनी व्यापारिक दुनिया में हर किस्म के लोगों से सामना किया होगा , उन्हें अपना बनाया होगा , उनपर जीत हासिल की होगी और तभी आप सफलता के इस मुकाम पर पहुँच पाये होंगे । जाहिर है कि साम, दाम, दण्ड और भेद -- इन चारों ही विद्याओं का प्रयोग आप करते रहने को विवश रहे होंगे । तो इस एंगिल से भी देखें तो एक अदद कम-अक्ल लडकी से आप पराजित हो जाना पसन्द करेंगे ?आपने उसकी हर इच्छा का दमन किया है । अब घड़ी आ गयी है कि आप उसकी इच्छा का पालन --- सिर्फ़ इलाज के तौर पर ही सही --- करके देखें । उसे थोड़ा घर से बाहर भी ले-जाकर घुमावें - फिरावें --- चाहे अल्प से अल्प अवधि के लिए क्यों न हो ! इसी तरह उसकी अन्य इच्छाओं का भी पालन करके देखें --- प्रयोगात्मक तौर पर ही सही । मेरा विश्वास है इसके जादूई परिणाम आयेंगे । एक बात ध्यान में रखिये -- 78 I. Q. वाली लड़की दिमाग से इतनी भी कमजोर नहीं होती कि उसके साथ दाम्पत्य-जीवन नहीं बिताया जा सकता । बेशर्म शब्दों का उल्लेख एक जरूरत के तौर पर करने को मजबूर हो रहा हूँ , क्षमा करेंगे ---- जिस लड़की को बच्चा पैदा करने तक का I. Q. उपलब्ध हो उसके साथ जिन्दगी नहीं काटी जा सकती इस विचार को कोई भी विचारक खारिज कर देगा । यदि कोई मर्द इसके विपरीत जिद करता रहे तो मामूली से मामूली विचारक भी बेहिचक कह सकता है कि यह और कुछ नहीं उसका पुरूष-जन्य अंहकार और पैसे का घमण्ड है ।
और अब अन्त में..... । आपके प्रति मेरे मन में -- आपके दुर्भाग्य को लेकर --- सचमुच गहरी सहानुभूति है । फ़िर भी, ज्यादा ठोस पुरुषार्थ सीखने की जरूरत है आपको । हार मान लेने में कहीं कोई बहादुरी नहीं होती, मर्द वह होता है जो कभी हार नहीं मानता । प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियाँ उसका जीवट नहीं छीन सकतीं । विजयश्री इस जीवन में मिल सके या न मिल सके -- उसे प्राप्त करने के प्रयास को हर पल जिंदा रखना ही असल पुरुषार्थ है । विजयश्री इस जीवन में न भी मिल पाए तो पर भी, जहाँ आपकी छत्र-छाया में इतने सारे लोगों का पालन-पोषण हो रहा है वहाँ एक अदद इन्सान की परवरिश और नहीं हो सकती ? आख़िर आपने उसके साथ अग्नि के समक्ष फेरे लिए थे ? उसके ऊपर जितना खर्च सम्भावित है उससे कहीं ज्यादा तो आपके यहाँ कुत्ते-बिल्लियों व गाय-भैसों पर हो जाता होगा ?...... आपने कहा कि उसमें कोई बदलाव नहीं आया है । हो सकता है आप सही हों । पर मुझे तो लगता है कि आप कहीं-न-कहीं पूर्वाग्रह से ग्रस्त ( PREJUDICED) हैं । मैंने तो यही सुना है कि आपने उसको एक शब्द बोलने तक का मौका ही नहीं दिया तो आप कैसे यह विचार बना ले सकते हैं कि उसमें कोई बदलाव नहीं आया है ? वह जैसे ही सामने आती है आप भयंकर रूप से आक्रामक हो उठते हैं -- उसे सामान्य ढंग से व्यवहार करने की दिशा में यह आपका भी कर्तव्य बनता है कि आप उसे अपने अन्दर हो चुके बदलाव को प्रदर्शित करने का वाजिब मौका दें। मुझसे उसने अपना यह संकल्प बयान किया है कि अब मैं कोई नादानी नहीं करूंगी। उनलोगों के अनुशासन में रहूँगी, कभी भी अपनी जुबान नहीं खोलूँगी। जितना अत्याचार मुझपर होता रहा है उससे ज्यादा भी होगा तो हंसकर सहूँगी और कभी मायके जाने का या मोबाईल पर बतियाने का प्रयास नहीं करूंगी । शिकायत का कोई मौका अबसे नहीं से नहीं दूंगी ।........ और क्या कहूं ?
आपका ही
--बड़े फूफाजी
19.06.08
पुनःश्च :
(1)अविश्वास का जो माहौल दोनों तरफ़ खामखाह व्याप्त है, उसके आलोक में एक साफगोई। बता चुका हूँ कि किन परिस्थितियों में और किस कारण से मैंने डाक्टर आर० के० चौधरी का प्रेस्क्रिप्शन अपने पास रखा था । उसे खोजने में थोड़ा वक्त लगा और किन्हीं अपरिहार्य कारणों से टाईप करने में विलम्ब हुआ । आशा है इस विलम्ब का आप कोई अन्य अर्थ नहीं निकालने लगेंगे । यह पत्र और डाक्टर के पुर्जे की प्रतिलिपि आपको ई-मेल से भेज रहा हूँ । तथापि स्पष्ट करना चाहूंगा कि डाक्टर के ओरिजनल पुर्जे को रजिस्ट्री से भेजना मुनासिब न होगा । इसलिए कि हमारी तकदीर इनदिनों काफी ख़राब चल रही है , खुदा-न-खास्ता यदि पोस्टल विभाग से यह गुम हो गयी तो आपको विश्वास दिलाना कठिन हो जायेगा कि गुम लिफाफे के अन्दर डाक्टर का ओरिजनल पुर्जा था । अतः जब आप मिलेंगे तो व्यक्तिगत रूप से आपके हाथों में ही इसे सौंपना मुनासिब होगा । और अगर फ़िर भी आप कहें कि रजिस्ट्री से भेज दें तो अवश्य भेज दूंगा ।
(2) टाईपिंग स्टेज में आकर मैंने ओरिजिनल पत्र में थोड़ा सा (बहुत ही मामूली) संशोधन किया है जिसका उद्देश्य सिर्फ़ अपने एहसास को थोड़ा और अधिक स्पष्ट करना है , विश्वास है कि इसका भी कोई अन्य नहीं लगायेंगे ।
(3) पत्रोत्तर देंगे और किसी बड़े के लिहाज जैसा नहीं , मित्र समझते हुए पत्राचार करते रहेंगे ।
------बड़े फूफाजी
19.06.08
Mohalla Live
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Mohalla Live
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गाली-मुक्त सिनेमा में आ पाएगा पूरा समाज?
Posted: 24 Jan 2015 12:35 AM PST
सिनेमा समाज की कहानी कहता है और...
11 वर्ष पहले

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